ज़ुबैदा बेगम: हिंदी सिनेमा की पहली बोलती फ़िल्म आलम आरा (1931) की हिरोइन की दास्तान

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By Mohammad Shameem Khan

ज़ुबैदा बेगम की ज़िन्दगी की दास्तान आज इस आर्टिकल में हम जानेंगे. भारतीय सिनेमा के सौ वर्ष होने की ख़ुशी में पूरे देश में जगह जगह कार्यक्रम आयोजित किये जा रहे थे, ऐसे ही एक कार्यक्रम में वक़्ता नरेश कापड़िया ने जब कहा कि हिंदी सिनेमा की पहली बोलती फ़िल्म की हीरोइन गुजरात से थीं, तो वहां के लोग आश्चर्यचकित रह गए थे कि भारतीय सिनेमा के स्वर्णिम इतिहास में सबसे ख़ूबसूरत पन्ना लिखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली अभिनेत्री दरअसल सूरत की रहने वाली थीं.

जी हाँ, हिंदी सिनेमा की पहली बोलती फ़िल्म आलम आरा 14 मार्च, 1931 को रिलीज़ हुई थी. इस फ़िल्म का निर्देशन अर्देशिर ईरानी ने किया था, और इस फ़िल्म की हेरोइन थीं, अदाकारा ज़ुबैदा बेगम धनराजगिरी.  ज़ुबैदा बेगम गुजरात की हीरानगरी सूरत की रहने वाली थीं.

ज़ुबैदा बेगम
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हिंदी सिनेमा की पहली बोलती फ़िल्म

आलम आरा से फ़िल्मों में एक अलग पहचान बनाने वाली अदाकारा ज़ुबैदा बेगम इस फ़िल्म में पृथ्वीराज कपूर और मास्टर विट्ठल के साथ नज़र आयी थीं. हिंदी सिनेमा में अपने योगदान के लिए ज़ुबैदा का सम्मान इसलिए भी ज़्यादा किया जाता है कि उन्होंने उस वक़्त पितृसत्तातमक दौर में रूढ़ियों को तोड़ा था, और हिम्मत दिखा के फ़िल्म में बतौर मुख्य अभिनेत्री का काम किया था. दोस्तों आपको बताते चलें कि उस दौर में पुरुष ही स्त्रियों का क़िरदार निभाया करते थे.

रॉयल ख़ानदान में पैदाइश

ज़ुबैदा बेगम की पैदाइश की तारीख़ तो पता नहीं चलती लेकिन हाँ वर्ष 1911 में सूरत में हुई. उनके वालिद सचिन (इस वक़्त सूरत शहर में आने वाला क्षेत्र) के नवाब इब्राहिम मुहम्मद याक़ूत ख़ान और माँ फ़ातिमा बेगम थीं. जुबैदा की मां, फातिमा बेगम (1905 – 1983) भारतीय सिनेमा की शुरुआती सितारों में से एक थीं. ज़ुबेदा अपनी तीन बहनों में सबसे बड़ी थीं, उनकी और बहनें शहज़ादी और सुल्ताना थीं. यह दोनों भी बाद में अभिनेत्रियां बनीं. ज़ुबेदा की करियर की शुरुवाती फिल्मों में देवदास (1937) और सागर मूवीटोन की फ़िल्म ‘मेरी जान’ शामिल हैं.

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फ़िल्मों में प्रवेश

ज़ुबैदा बेगम ने बहुत काम उम्र से ही फिल्मों में प्रवेश किया था, वो महज़ 12 साल की थीं जब उन्होंने कोहिनूर फ़िल्म से अपने एक्टिंग करियर में डेब्यू किया था. 1920 के दशक में उन्होंने अपनी बहन सुल्ताना के साथ अभिनय किया. इन दोनों बहनों ने बाद में कई फिल्मों में काम किया जिनमें से एक थीं 1924 की रिलीज़ फ़िल्म ‘कल्याण खजीना.’ इन दोनों बहनों ने अपनी माँ के साथ ‘वीर अभिमन्युं’ में भी साथ काम किया था.

जैसा कि मैंने आपको बताया कि ज़ुबैदा ने मूक फ़िल्मों से अपने करियर की पारी शुरू की लेकिन आलम आरा उनके करियर का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ और उनकी सबसे बड़ी हिट फ़िल्म रही. वह अचानक से हॉट प्रॉपर्टी बन गईं और फ़िल्म इंडस्ट्री में सबसे ज़्यादा वेतन पाने वाली अदाकारा बन गयीं.

ज़ुबैदा ने मूक फ़िल्मों में भी काम किया

1925 में ज़ुबैदा बेगम ने नौ फ़िल्मों में काम किया जिनमें से कला चोर, देवदासी और देश का दुश्मन जैसी फिल्में शामिल हैं. 1926 में उन्होंने अपनी माँ की फ़िल्म बुलबुल-ए-परिस्तान में काम किया. 1927 में लैला मजनू, नंदन भोजई और नवल गांधी की बलिदान फ़िल्म उनके करियर की यादगार और सफल फिल्में थीं. रवींद्रनाथ टैगोर की कहानी ‘बालिदान’ पर आधारित फ़िल्म में बाद में सुलोचना देवी, मास्टर विट्ठल और जल खंबट्टा ने भी अभिनय किया.

यह फ़िल्म बंगाल के कुछ काली मंदिरों में पशु बलि की सदियों पुरानी प्रथा की निंदा करती थी. इंडियन सिनेमेटोग्राफी समिति के सदस्य इस “उत्कृष्ट और सही मायने में भारतीय फिल्म” को देखकर एकदम मंत्रमुग्ध हो गए थे. इसके यूरोपीय सदस्यों ने सिफारिश की थी कि इसकी स्क्रीनिंग दूसरे देशों में भी की जाये.

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30 से 40 के दशक में दीं सुपर हिट फ़िल्में

30 और 40 के दशक की शुरुआत में उन्होंने जल मर्चेंट के साथ मिलकर एक हिट टीम बनाई और कई सफल पौराणिक कथाओं पर आधारित फिल्मों में काम किया जैसे सुभद्रा, उत्तरा और द्रौपदी जैसे पात्रों की भूमिका निभाई. उन्होंने एज्रा मीर की जरीना जैसी फिल्मों में काम किया और दर्शकों के दिलों को झकझोर दिया, इस फ़िल्म में उन्होंने एक जीवंत, अस्थिर सर्कस की लड़की की भूमिका निभाई थी, जिसके चुंबन ने सिल्वर स्क्रीन पर धूम मचा दी और सेंसरशिप पर एक गर्म बहस छिड़ गयी थी. ज़ुबैदा उन उन गिनी चुनी अभिनेत्रियों में से एक थीं जिन्होंने मूक युग से टॉकीज़ में काम किया था.

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1934 में उन्होंने नानुभाई वकील के साथ महालक्ष्मी मूवीटोन नाम का प्रोडक्शन हाउस बनाया और इस प्रोडक्शन के बैनर के तले ‘गुल-ए-सोनोबार’ और ‘रसिक-ए-लैला’ जैसी फ़िल्में बनाई जो बॉक्स-ऑफिस पर काफ़ी सफल रही. वह 1949 तक साल में एक या दो फ़िल्मों में दिखाई देती रहीं. ‘निर्दोष अबला’ शायद उनकी आख़िरी फ़िल्म थी.

निजी ज़िन्दगी

 ज़ुबैदा बेगम ने हैदराबाद के महाराज नरसिंगिर धनराजगीर ज्ञान बहादुर से शादी की. वह हुमायूं धनराजगीर और धुरेश्वर धनराजगीर की मां थीं. धुरेश्वर मशहूर और मारूफ़ मॉडल रिया पिल्लई की मां हैं. ज़ुबैदा ने अपने ज़िन्दग़ी के आख़िरी साल परिवार के बॉम्बे पैलेस, धनराज महल में बिताए. 21 सितंबर 1988 को वो ये फ़ानी दुनिया छोड़ कर चली गयीं, छत्रपति शिवाजी महाराज मार्ग, अपोलो बंदर, कोलाबा, दक्षिण मुंबई में उनको सुपुर्द- ए- खाक़ किया गया.

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