शंकर – शम्भू की मशहूर क़व्वाल जोड़ी: 8 अलग-अलग भाषाओं में धाराप्रवाह गाते थे.

Photo of author

By Mohammad Shameem Khan

शंकर – शम्भू की क़व्वाल भाइयों की जोड़ी शायद हिंदुस्तान की पहली हिन्दू क़व्वाल जोड़ी रही होगी जिसने खूब शोहरत हासिल की और हो भी क्यों ना वह थे ही इतने क़ाबिल. कहते हैं, मौसिक़ी, गीत संगीत में कोई दीन और धर्म नहीं होता है, ये ख़ुद एक धर्म है ऐसे बहुत से गायक रहे जिन्होंने मौसिक़ी के ज़रिये अपने ख़ुदा या रब की इबादत की, उन्ही गायकों में से एक थे- मशहूर और मारूफ क़व्वाल भाइयों की जोड़ी – शंकर- शम्भू की.

भला इस सूफी गायक और कव्वाल जोड़ी को भाई शंकर – शम्भू को भला कौन नहीं जनता होगा वो थे ही इतने कमाल के, जब वो अपने ख़ूबसूरत अंदाज़ में क़व्वाली पेश करते तो सुनने वाले बस उसी में खो जाते. उनकी पुरनूर आवाज़ हर किसी को अपनी तरफ खींचती थी चाहे वो कोई बड़ा हो या बूढ़ा. उन्होंने दरगाहों, मंदिरों और गुरद्वारों में गाया. उनकी याद आज के दौर में और आती है जब क़व्वाली गायन को एक ख़ास तबके साथ जोड़ कर देखा जाता है, मेरे ख़याल से वो इस पूरे महाद्वीप के एकलौते हिन्दू क़व्वाल रहे होंगे.

शंकर और शम्भू
तस्वीर: सोशल मीडिया

उनकी क़व्वाली सुनने वालों में मशहूर फ़िल्म निर्देशक महबूब ख़ान भी शामिल थे

अजमेर में उर्स शरीफ में उन्होंने अपनी क़व्वाली से अपने सुनने वालों को रुला दिया था, उनको सुनने और रोने वालों में मशहूर और मारूफ़ फिल्म निर्माता महबूब खान भी थे. महबूब ख़ान, शंकर – शम्भू से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उन्हें अपने महबूब स्टूडियो के उद्घाटन समारोह में गाने के लिए बाबई आमंत्रित किया. जल्द ही शंकर और शम्भू की गायन प्रतिभा को पूरे देश ने प्यार और दुलार दिया और उन्होंने ख़ुद को हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री में पार्श्व गायक और संगीत निर्देशक के रूप में स्थापित कर लिया, जिन्होंने तीसरी कसम (1966) से “किस्सा होता है शुरू,” इस गीत में उनके साथ मुबारक बेगम ने भी गाया था, हसरत जयपुरी के लिखे इस गीत को शंकर जयकिशन ने संगीत से सजाया था, और लैला मजनू (1976) से- हो के मायूस तेरे दर से सवाली ना गाया- इस गीत को उन्होंने मो रफ़ी, अम्बर कुमार और अज़ीज़ नज़ान के साथ मिलकर गाया था – जैसे गाने गाये. उन्होंने तुम्हारा कल्लू (1975) और काला सूरज (1986) जैसी फिल्मों में संगीत निर्देशन का ज़िम्मा भी संभाला.

शंकर और शम्भू
तस्वीर: सोशल मीडिया

क़व्वाल की ज़िन्दगी के शुरुवाती दिन

शंकर – शम्भू की पैदाइश उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले के दरियापुर के चंदौसी गांव में हुई थी लेकिन किस साल में इनकी पैदाइश हुई यह पता नहीं चलता है. शंकर और शंभू संगीत से सराबोर माहौल में पले-बढ़े। शंकर जब 7 साल के थे और शम्भू जब 5 साल के थे, तब उन्होंने अपने वालिद साहब चुन्नीलाल उस्ताद के मार्गदर्शन में संगीत सीखना शुरू किया. एक प्रसिद्ध लोक और शास्त्रीय गायक, चुन्नीलाल उस्ताद पूरे उत्तर प्रदेश में एक नौटंकी (रंगमंच) समूह भी चलते थे. इन भाइयों की जोड़ी ने आगे चलकर जयपुर घराने के गुरु श्री मोहनलाल जी से भारतीय शास्त्रीय संगीत का प्रशिक्षण प्राप्त किया. दिल्ली घराने के उस्ताद चांद खान साहब ने भी अपनी तालीम से इन्हे नवाज़ा. उर्दू, अरबी और फ़ारसी के शायर जनाब शारिक ईरानी और जनाब कमर सुलेमानी से उर्दू, अरबी और फ़ारसी की तालीम हासिल की. जल्द ही, उन्होंने ग़ज़ल, क़व्वाली और सूफ़ियाना क़लाम गाते हुए सार्वजनिक रूप से लाइव प्रदर्शन करना शुरू कर दिया.

अजमेर शरीफ के हज़रत ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ के उर्स शरीफ में क़व्वाली गाने के लिए तीन दिन तक उपवास रखा

कलाकारों के रूप में उनकी प्रसिद्धि तब और बढ़ गई जब उन्हें कानपुर में हजरत सूफी साहब दरगाह शरीफ के गद्दी नशीन ने अजमेर शरीफ के हज़रत ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ के उर्स शरीफ में क़व्वाली गाने की सलाह दी. हालांकि, पवित्र स्थान पर प्रस्तुति देने के लिए कलाकारों की लंबी कतार की वजह से, एकदम नयी और अंजान जोड़ी को महफिल ख़ाना में गाने का मौका नहीं मिला. शंकर ने दरगाह शरीफ के सामने पूरे तीन दिन बिना पानी के उपवास करने का फैसला लिया. जब अजमेर शरीफ के प्रबंधन को चौथे दिन इस बात का पता चला, तो उन्होंने उर्स शरीफ के आख़िरी दिन महफिलखाने में क़व्वाली गाने की इजाज़त दे दी. कहा जाता है कि महबूब-ए- किबरिया से मेरा सलाम कहना गाकर शंकर- शंभू ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया, उस हुजूम में जिस जिस ने उनकी क़व्वाली सुनी सबकी आँखों में आंसू थे. उस दिन के बाद से , उन्हें ‘क़व्वाल’ की उपाधि से सम्मानित किया गया, जो शंकर-शंभु क़व्वाल के नाम से प्रसिद्ध हुए.

शंकर – शम्भू
तस्वीर: सोशल मीडिया

शंकर – शम्भू ने अभी तो ये सफ़र शुरू ही किया था उन्हें तो बहुत आगे जाना था. अजमेर शरीफ में उनकी क़व्वाली सुनकर आंसुओं में सराबोर होने वालों में फिल्म निर्माता महबूब खान भी थे. बाद में उन्होंने उनसे मुलाकात की और बांद्रा में जल्द ही लॉन्च होने वाले महबूब स्टूडियो के उद्घाटन पर गाने के लिए उन्हें बॉम्बे आमंत्रित किया. इस प्रकार, शंकर-शंभू बॉम्बे पहुंचे, फिल्म इंडस्ट्री में उनका गर्मजोशी से स्वागत किया.

बॉम्बे में उन्होंने जब हाजी अली की दरगाह पर गाया तो उन्हें सुनने के लिए जैसे पूरा शहर ही आ गाया हो. वह पूरे मुल्क में सूफ़ी गायक के तौर पर मशहूर हो गए. लाइव गाने के साथ साथ उन्होंने ख़ुद को फिल्मों में प्लेबैक सिंगिंग के लिए तैयार किया. उन्होंने तुम्हारा कल्लू (1975), हिंद की वली (1978) और बिंदिया (1978) में संगीत निर्देशक के तौर पर काम किया. उन्होंने बादल और बिजली (1956), तुम्हारा कल्लू, बरसात की रात (1960) और लैला मजनू (1976) में भी प्लेबैक किया, इसके अलावा फ़िल्म ‘तुम्हारा कल्लू’ में वह स्क्रीन पर दिखाई भी दिए.

शंकर और शम्भू को शहंशाह-ए-कव्वाल जैसे सम्मानों से भी सम्मानित किया गया

सूफ़ियाना क़लाम के धनी, शंकर – शम्भू भजन, माता की भेंटें, गुरबानी और साईं भजन जैसी अन्य विधाओं को गाने में भी माहिर थे, 8 अलग-अलग भाषाओं में वो धाराप्रवाह गाते थे. पूरे भारत के साथ-साथ विदेशों में भी उनके बहुत से प्रोग्राम्स हुए, उन्होंने सभी जातियों और धर्मों के प्रशंसकों से बेशुमार मोहब्बत और तारीफें बटोरीं. आमतौर पर मुस्लिम गायकों के डोमेन वाली क़व्वाली की कला में उनकी महारत ने उनके दर्शकों को चकित कर दिया. उन्होंने डॉ ज़ाकिर हुसैन और अटल बिहारी वाजपेयी जैसी महान भारतीय हस्तियों से प्रशंसा हासिल की, और उन्हें ख़्वाजा पसंद,”फनाफिल मोइन”, कौमी एकता के प्रतीक, और शहंशाह-ए-कव्वाल जैसे सम्मानों से भी सम्मानित किया गया.


शंकरशम्भू ने “आलम आरा”, “तीसरी कसम”, “बरसात की रात”, “प्रोफेसर और जादूगर”, “शान-ए-खुदा”, “मेरे दाता गरीब नवाज”, “तीसरा पत्थर” “बेगुनाह क़ैदी”, “लैला मजनू”, “बादल”, “तुम्हारा कल्लू”, “मंदिर मस्जिद” जैसी फिल्मों में पार्श्व गायन किया.

रेडियो के अच्छे पुराने दिनों में शंकर शम्भू हर तरह से अपने चाहने वालों के दिलों पर हावी थे, जिसने उनकी सुनहरी आवाज़ को इंडिया के घर तक पहुँचाया और जल्द ही ये सूफी गायक देश में एक बहुत बड़ा नाम बन गाया.

ये दोनों भाई वास्तव में उर्दू-भाषी दर्शकों के लिए एक सनसनी की तरह थे। कई लोगों ने सोचा होगा कि उन्होंने क़व्वाली की कला में कैसे महारत हासिल कर ली है जोकि आमतौर माना जाता है कि इस गायन शैली पर मुस्लिम गायकों की विशेषता है. लेकिन मौसिक़ी किसी भी जाति, धर्म से बहुत ऊपर है और सबसे बड़ी बात गायन की किसी भी शैली को किसी धर्म विशेष से जोड़ कर देखना उस गायन शैली के साथ सरासर ना-इंसाफ़ी है. इंडिया की बहुल सांस्कृतिक परंपरा के साथ जीने का उनका प्रयास, जिसने उन्हें हर तरफ़ तारीफ़ ही दिलाई.

शंकर और शम्भू
तस्वीर: सोशल मीडिया

हालाँकि उनकी सफलता की कहानी तब अधूरी रह गई जब बड़े भाई शंकर का 10 मार्च, 1984 को डूंगरपुर, राजस्थान में एक कार्यक्रम से लौटते वक़्त एक सड़क दुर्घटना में वो इस दुनिया-ए-फ़ानी से रुख़्सत हो गए और शंकर-शंभु की मशहूर जोड़ी टूट गई.


शंकर से दो साल छोटे भाई शंभू का 5 फरवरी, 1989 को दिल्ली में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया. इन दोनों की संगीत परंपरा आज भी जारी है, क्योंकि शंकर और शम्भू के शाहबज़ादों ने संगीत की ये परंपरा जारी रखी. शंभू के बेटे राकेश पंडित एक पार्श्व गायक हैं और उनके दूसरे बेटे दीपक पंडित हिंदी फिल्मों में एक प्रसिद्ध-वायलिन वादक हैं. शंकर के बेटे राम शंकर भी पेशे से संगीत निर्देशक और गायक हैं. शंकर-शंभू अपने संगीत के ज़रिये , विविधता में भारतीय एकता के प्रतीक बने हुए हैं, और वह देश की समृद्ध, बहुलतावादी सांस्कृतिक परंपराओं के प्रतीक हैं.
उम्मीद करता हूँ कि शंकर – शम्भू की यह दास्ताँ पसंद आयी होगी.

Leave a Comment

error: Content is protected !!